मैं युवा हूँ, ठंडी चाय नहीं
मैं युवा हूँ, ठंडी चाय नहीं,
जो कप में पड़ी-पड़ी ठंडी हो जाए।
मैं सभ्य हूँ, कमजोर नहीं,
जो गाली खाकर भी मुस्कुरा जाए।
मैं भविष्य हूँ, भूत नहीं,
जिसे तुम इतिहास की किताबों में बंद कर दोगे।
मुझे मारा, गाली दी, मैं चुप रहा,
लाठियां बरसीं, आंसू गैस के गोले दागे,
मैं फिर भी चुप रहा…
क्योंकि मैं सभ्य हूँ।
मैंने इस देश को अपना माना है,
इसलिए सड़क पर खून नहीं,
संवाद की स्याही बहाई है।
पर आप ये मत भूलना,
आप राजा नहीं, सेवक हैं।
पुलिस, फौज, कानून —
ये देश की हैं, आपकी जागीर नहीं।
मैं चुप हूँ आज,
पर मेरी चुप्पी को कमजोरी मत समझना।
मैं युवा हूँ…
और जब युवा बोलता है,
तो तख्त भी हिलते हैं, ताज भी।
राकेश फीने वाले
